दहेलवालजी की देहरूपी सर्प की सवारी निकाली: आसपास के गांवों के हजारों लोग पहुंचे सवारी देखने


बूंदी18 मिनट पहले

बूंदी के आंतरदा गांव में सोमवार को दहेलवालजी की देहरूपी सर्प की सवारी गाजे-बाजे के साथ निकाली गई।

बूंदी के आंतरदा गांव में सोमवार को दहेलवालजी की देहरूपी सर्प की सवारी गाजे-बाजे के साथ निकाली गई। इसको देखने आसपास के गांवों के हजारों ग्रामीण उमड़े। ऊडालिया की डूंगरी से रवाना हुई सवारी परकोर्ट बालाजी मार्ग होते हुए बड़ा दरवाजा होकर गढ़ चौक पहुंची।

दहेलवालजी की देहरूपी सर्प की सवारी सोमवार को गाजे-बाजे के साथ निकाली गई।

दोपहर करीब दो बजे पंच पटेल तथा पूर्व राज परिवार के अभिषेक सिंह, मानवेंद्र सिंह, समर प्रताप सिंह के नेतृत्व में तलवास रोड़ पर स्थित ऊडालिया की डूंगरी स्थान पर गाजे-बाजे के साथ चवंर, ढोल, गद्दी, झालर, केवड़ा, बाजोट, झण्डी, छड़ी व अन्य पूजा के सामान लेकर पहुंचे। जहां दहेलवालजी देहरूपी सर्प के रूप में खेजड़ी के पेड़ पर मिले। पंच पटेलों ने पूजा व साथ चलने की मान मनुहार की। यह दौर करीब एक से डेढ़ घंटे तक चलता रहा। इस दौरान तेजाजी गायन मंडलियां अलगोजों व लोक वाद्ययंत्रों की धुनों पर तेजाजी गायन करती रही।

श्रद्धालु जयकारे लगाते रहे। पूर्व राज परिवार के सदस्यों ने फूलों से पूजा कर साथ चलने की विनती की। इसके बाद देहरूपी सर्प भोपा प्रभुलाल कीर के साफे में आ गए। इसी के साथ ही महाराज के जयकारे गूंजने लगे। भोपा व उनके सहयोगी साथी देहरूपी सर्प को लेकर सवारी के रूप में रवाना हुए, जो परकोटे बालाजी मार्ग होते हुए बड़ा दरवाजा होकर गढ़ चौक पहुंचे। मार्ग में जगह जगह श्रद्धालुओं ने दहेलवालजी महाराज की पूजा अर्चना के साथ दर्शन किए। बाद में गढ़ के अंदर पूर्व राज परिवार के सदस्यों ने महाराज के दर्शन किए तथा सलामी देकर अगवानी की। सवारी करवर रोड स्थित दहेलवाल जी के थानक पहुंची। जहां दहेलवालजी की देह को एक वृक्ष पर छोड़ा गया।

आंतरदा में आते हैं दहेलवालजी महाराज
वर्ष 1871 में तत्कालीन आंतरदा रियासत में देवी सिंह की पत्नी जुन्या (टोंक) की राजकुमारी थी। उन्हें किसी सर्प ने डंस लिया था। तब उन्हें जुन्या के दहेलवालजी की तांती (डस्सी) बांधी गई थी। बाद में आंतरदा के ठिकानेदार ने दरबार में तेजा दशमी पर रानी को तांती कटवाने जुन्या भेजा। उनके साथ गांव के लोक कलाकार भी गए। संगीत मंडली व दरबार की भावना को देखकर देहलवाल जी खुश हो गए। किवंदती के अनुसार तब आंतरदा में दहेलवालजी का थानक बनाया गया। उनको आंतरदा के लिए न्योता भेजा गया। स्वीकृति दी तो दहाड़या नामक स्थान पर वर्ष 1878 में स्थानक बनाया गया। तभी से आंतरदा में तेजादशमी के दिन देहरूपी सर्प के रूप में आने की परम्परा शुरू हो गई। इस परंपरा को करीब 145 साल हो गए।

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